
धनबाद । रात के करीब साढ़े नौ बज रहे हैं और इस वक्त मैं स्थानीय रेलवे स्टेशन के परिसर में खड़ा हूँ। आमतौर पर इस समय यहाँ यात्रियों की आवाजाही कम होने लगती है, लेकिन आज यहाँ का नजारा हृदयविदारक है। स्टेशन के मुख्य प्रवेश द्वार से लेकर पूरे परिसर की फर्श तक, जहाँ भी नजर जा रही है, वहां झारखंड के युवाओं का सैलाब दिख रहा है। ये वे अभ्यर्थी हैं जो झारखंड उत्पाद सिपाही प्रतियोगिता परीक्षा में शामिल होने के लिए राज्य के अलग-अलग जिलों से यहाँ पहुंचे हैं। इन युवाओं के पास सिर छिपाने के लिए न कोई छत है और न ही रहने का कोई ठिकाना, जिसके कारण ये कड़कड़ाती थकान के बीच स्टेशन की ठंडी जमीन पर सोने को मजबूर हैं। कोई अपने भारी बैग को तकिया बनाकर लेटा है, तो कोई महज़ एक पतली चादर के सहारे अपनी रात काटने की कोशिश कर रहा है।
यह दृश्य व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। ये युवा हमारे राज्य और देश के भविष्य हैं, जो अपने कंधों पर परिवार की उम्मीदें और आँखों में सुनहरे कल का सपना लेकर यहाँ आए हैं। परीक्षा लेने वाली एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन को इस पहलू पर गहराई से सोचना चाहिए। जिस तत्परता और मुस्तैदी के साथ एजेंसियां परीक्षा की शुचिता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाती हैं, क्या उतनी ही संवेदनशीलता इन परीक्षार्थियों की बुनियादी सहूलियत के लिए नहीं दिखाई जानी चाहिए थी? जब एक अभ्यर्थी रात भर स्टेशन की जमीन पर जागकर या असुरक्षित स्थिति में गुजारता है, तो वह मानसिक और शारीरिक रूप से परीक्षा देने के लिए कितना तैयार रह पाता होगा, यह विचारणीय है।
